“होर्मुज़ संकट: तेल की आग में जलता एशिया, लेकिन चीन क्यों है बेफ़िक्र?”
होर्मुज़ स्ट्रेट पर ईरान की नाकेबंदी से एशिया में तेल संकट गहराया, लेकिन रूसी तेल और कोयले की बदौलत चीन की स्थिति बेहतर

ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने आज वैश्विक अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ने वाले ‘काले सोने’ यानी कच्चे तेल की सप्लाई को खतरे में डाल दिया है। दुनिया का सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता, होर्मुज़ स्ट्रेट, आज युद्ध के बारूद से महक रहा है। ईरान द्वारा इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर हमले की धमकी ने पूरे एशिया में हड़कंप मचा दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि फिलीपींस जैसे देशों ने ईंधन बचाने के लिए चार दिन का वर्क-वीक लागू कर दिया है, वहीं इंडोनेशिया अपने खाली होते तेल भंडारों को बचाने के लिए छटपटा रहा है। लेकिन इस वैश्विक हाहाकार के बीच, दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार चीन, अपने पड़ोसियों के मुकाबले काफी शांत और सुरक्षित नजर आ रहा है।
चीन की इस बेफिक्री के पीछे उसकी बरसों की सोची-समझी ऊर्जा रणनीति और रूस के साथ उसकी गहरी दोस्ती है। जहां एशिया के अन्य देश खाड़ी के देशों से आने वाले तेल पर पूरी तरह निर्भर हैं, वहीं चीन ने अपने तेल के स्रोतों को बांट रखा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद लगे प्रतिबंधों के बावजूद, रूस आज चीन का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। उत्तरी चीन की तेल जरूरतें रूस से आने वाली विशाल पाइपलाइनों के जरिए पूरी हो रही हैं, जिन पर होर्मुज़ की नाकेबंदी का कोई असर नहीं पड़ता। इसके अलावा, चीन दुनिया का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक भी है। उसकी बिजली सप्लाई का मुख्य आधार आज भी कोयला है, जिससे उसकी फैक्ट्रियों के पहिए तेल की कमी के बावजूद नहीं रुकने वाले।
विशेषज्ञों का मानना है कि $120 प्रति बैरल तक पहुंचती तेल की कीमतें चीन के परिवहन सेक्टर के लिए थोड़ी चुनौती जरूर पेश करेंगी, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था को ढहा नहीं पाएंगी। चीन के कुल ऊर्जा मिश्रण में तेल और गैस की हिस्सेदारी सिर्फ एक चौथाई से थोड़ी ज्यादा है, जो उसे यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षित बनाती है। आज जब पूरी दुनिया होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकेबंदी से सहमी हुई है, तब चीन का रूसी तेल और अपने विशाल कोयला भंडार पर भरोसा उसे इस महासंकट में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में खड़ा कर रहा है।




