अतीत की वैभव गाथा समेटे जमुई का ‘नौलखागढ़’ माँग रहा अपना वजूद, विश्व धरोहर दिवस पर संरक्षण की दरकार
स्थापत्य का अजूबा: बिना छत के ठोस शिलाखंडों पर टिकी हैं 35 फीट ऊँची दीवारें, गोथिक शैली का है प्रभाव

जमुई:-प्रकृति की सुरम्य सुषमा से सुशोभित गिद्धेश्वर पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित ‘नौलखागढ़’ आज भी अपने भीतर गौरवशाली इतिहास के कई अनसुलझे रहस्य समेटे हुए है। 18 अप्रैल को ‘विश्व धरोहर दिवस’ पर जब दुनिया अपनी विरासतों को सहेजने का संकल्प ले रही है, जमुई की यह अनमोल धरोहर पुरातत्व विभाग की उदासीनता के कारण खंडहर में तब्दील हो रही है। यह किला आज संरक्षण के अभाव में सिसकियां भर रहा है। अगर समय रहते इसकी सूद नहीं ली गई तो केवल हम स्थानीय कहानियों में सुनेंगे कि किस प्रकार पुरातत्व विभाग और प्रशासन की उदासीनता के कारण यह किला पूर्णतः ध्वस्त हो गया।
इतिहासकारों की नजर में नौलखागढ़: एक रहस्य
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नौलखागढ़ के निर्माता को लेकर तमाम इतिहासकारों ने अलग-अलग तर्क दिए हैं, जो इसकी प्रासंगिकता को और बढ़ाते हैं:
बुकानन (1811):बुकानन इसे मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित मानने के पक्ष में कतई नहीं थे। उन्होंने द्वार पर स्थित शिव की प्रतिमा को आधार मानते हुए इसका संबंध पालवंश के इन्दपैगढ़ (11वीं-12वीं शताब्दी) के राजा इन्द्रद्युम्न से जोड़ा। उनका मानना था कि शेरशाह ने हुमायूं से युद्ध के दौरान केवल इस पुराने दुर्ग का उपयोग किया होगा।
बेगलर (1871-73): पुराविद् बेगलर को यहाँ के द्वारों पर हिंदू मंदिरों जैसे खंभे मिले, जिनके ऊपर मुस्लिम शैली के नुकीले मेहराब बनाए गए थे। उनके अनुसार, यह मूलतः हिंदू वास्तुशिल्प था जिसे शेरशाह ने हड़बड़ी में मरम्मत करवाकर नया रूप दिया। उन्होंने इसे ‘गोथिक स्थापत्य’ का अनूठा उदाहरण माना।
डॉ. डी.आर. पाटिल: डॉ. पाटिल ने इसे शेरशाह की कृति माना। उन्होंने इसके अर्द्धनिर्मित रहने का ठोस कारण बताया कि किले के बगल में स्थित ऊँची पहाड़ी से यह दुर्ग तोप के निशाने (शूटिंग रेंज)के भीतर आता था। असुरक्षा के चलते शेरशाह ने इसे बीच में ही छोड़ दिया।
डब्लू. डब्लू. हंटर: हंटर का तर्क था कि यह दुर्ग शेरशाह के काल से कहीं अधिक प्राचीन मालूम पड़ता है। दक्षिणी दीवार पर बेतरतीब ढंग से रखे गए बड़े-बड़े शिलाखंड,इस बात के प्रमाण हैं कि किसी पुराने टूटे भाग की मरम्मत बेहद जल्दबाजी में की गई थी, जो संभवतः शेरशाह ने अपनी मोर्चाबंदी के लिए की होगी।
ब्लॉश (1903-04):-ब्लॉश ने इसे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच होने के कारण एक ‘शिकार गृह’ और सुरक्षित सैन्य छावनी माना। उनके अनुसार इसकी दीवारों की बनावट रोहतास के शेरगढ़ जैसी है, जो इसके निर्माण काल को 16वीं शताब्दी की ओर ले जाती है।
स्थापत्य का अजूबा उदाहरण और धार्मिक मान्यता
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नौलखागढ़ स्थापत्य कला का एक ऐसा अजूबा है,तमाम इतिहासकार इसे गोथिक कला का उदाहरण मानते है। जहाँ पत्थर के विशाल बोल्डर्स को सुर्खी-चूने से जोड़ा गया है। करीब 473 फीट लंबे और 523 फीट चौड़े इस किले की सबसे बड़ी विशेषता इसका बिना छत का होना है। स्थानीय ग्रामीण इसे ’52 कोठी 53 द्वार’ वाला महल कहते हैं और किंवदंती है कि शिल्पदेव विश्वकर्मा ने इसे रातों-रात बनाया था।
विनष्ट हो रहा पुरातात्विक महत्व
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विडंबना यह है कि जमुई की यह ऐतिहासिक धरोहर आज असामाजिक तत्वों और ठेकेदारों की भेंट चढ़ रही है। दुर्ग की कीमती शिलाएं और बोल्डर्स गायब किए जा रहे हैं। जमुई संग्रहालय में सुरक्षित कुछ ताम्र सिक्के ही इसके स्वर्णिम काल का एकमात्र आधिकारिक प्रमाण बचे हैं। यदि जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग इस ओर ध्यान दे, तो यह स्थान न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि राज्य के राजस्व का भी बड़ा केंद्र बन सकता है।
नौलखा गढ़ की खासियत
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दीवारें: जमीन पर 22.5 फीट मोटी और 35 फीट ऊँची
सीढ़ियाँ: दीवार के शीर्ष पर चढ़ने के लिए 8 सीढ़ियाँ, प्रत्येक में 35 कदम।
बुर्ज: निगरानी के लिए चहारदीवारी पर बने 12 विशाल बुर्ज।
द्वार: गजद्वार (उत्तर), उष्ट्र द्वार (दक्षिण), अश्वद्वार (पूर्व) और महादेव द्वार (पश्चिम)।
क्या कहते हैं इतिहासकार
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इतिहासकार डाॅ. श्यामानंद प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तक “जमुई का इतिहास और पुरातत्व”में वह बताते हैं कि इस गढ़ का निर्माण करने में नौ लाख रुपया खर्च हुए थे इसलिए यह नौलखा गढ़ कहलाता है । देवघर में इसी अनुश्रुति से जुड़ा हुआ एक नौलखा मंदिर है । इस विशालगढ़ के निर्माण में कितनी राशि का व्यय हुआ था इसका लेखा-जोखा तो नहीं मिलता,परंतु उसके निर्माण की विशालता वस्तु उपकरण आदि देखकर आज भी इसका नौलखा गढ़ नाम सार्थक प्रतीत होता है। पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से विशिष्ट यह अवशेष न केवल जमुई प्रदेश की, बल्कि पूरे राज्य की अनमोल संपत्ति है। नौलखा गढ़ इतना प्राचीन है कि कई पुरातत्ववेदत्ताओं एवं इतिहासकारों द्वारा अलग-अलग समय में अपने तौर तरीको से उन्होंने इसका वर्णन किया है।




